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Judaai poem। Kasam duriyo ki



दूरियों की परवाह ना तुमने की ना मैंने की।
अपने दर्द पे आह ना तुमने की ना मैंने की।।

वक्त बीतता रहा तुझसे मिलने के इंतजार में।
फिर भी वक्त से बगावत ना तुमने की ना मैंने की।।

एक अरसा बीत गया तुझसे दीदार को हमदम।
फिर भी किसी और से मोहब्बत ना तुमने की ना मैंने की।।

इतना यकीन है हमें अपनी वफाओं पर की।
एक दूसरे से शिकायत ना तुमने की ना मैंने की।।

न जाने कितने पड़ाव पार किए हम दोनों ने।
फिर भी समझौता हालात से ना तुमने की ना मैंने की।।

खुदा भी पूछ बैठा तेरी मोहब्बत में इतनी शिद्दत क्यों है।
फिर भी उनसे कोई सवाल ना तुमने की ना मैंने की।।

दिल उनके सामने सारे राज खोल भी दिया।
फिर भी उनसे,मिलने की दुआ ना तुमने की ना मैंने की।।

क्योंकि कर दिया था जुदा हमें एक दूसरे की कसम देकर।
और उस दिन से एक मुलाकात ना तुमने की ना मैंने की।।

*****

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