एक परिंदा

आसमां बनके वो मेरी हिफाज़त करता है,
सलामत रहू मैं रब से इबादत करता है,
बरसता है मेरे हर दर्द पे मरहम की तरह,
जाने क्यों एक परिंदा मुझसे....
इतनी मोहब्बत करता है..!

आसूँ का एक कतरा....
ज़मीं पे न गिरने देता है,
हर बूँद को अपनी हथेली में थाम लेता है,
न जाने वो कैसा फरिश्ता है,
मुझे हँसाने की खातिर खुद रो देता है,
मेरे लिए वो खुद को भी खो देता है,
ऐसी वो मुझपे इनायत करता है,
जाने क्यों एक परिंदा मुझसे......
इतनी मोहब्बत करता है....!

दूर होकर भी दुरी का...
एहसास वो होने नही देता,
नींद भी आये तो वो सोने नही देता,
सुन कर उसकी बातें.....
होठों से मुस्कान हटती नही,
रूठ जाने पे वो ऐसी शरारत करता है,
जाने क्यों एक परिंदा मुझसे....
इतनी मोहब्बत करता है....!
                                   

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