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कागज का टुकड़ा

पन्ने पलटते-पलटते जमीं पे गिर पड़ा,
वो कागज के टुकड़े जाने कबसे,
मेरी किताब मे बंद पड़े थे,
नजरे जब उनपे पड़ी तो,
हाथो ने उन्हे खोलना चाहा,
आँखो ने उन्हे पढ़ना चाहा,
शायद बीते वक्त के कुछ अल्फाज लिखे थे,
कुछ अधूरे जैसे ख्वाब लिखे थे,
न तारीख का पता था न दिन की खबर थी,
उन अल्फाजो से तो खुद बेखबर थी,
न जाने कितने एहसास कितने जज्बात,
दबे रहते है हमारे जहन मे,
शायद वही जज्बात स्याही मे लिपट कर,
उस कागज पे उतरे थे,
उन्हे देख कुछ याद तो आता था,
बीते पलो की कुछ बात बताता था,
यूही नही रखे थे हम उन्हे किताब मे,
उन अल्फाजो से शायद मेरा कुछ तो नाता था,
जाने ऐसे कितने कागज के टुकड़े,
बिखड़े होते है किताबो के अंदर,
उन टुकड़ो को जोड़ देती हू "तन्वी",
तो बन जाते है वो अल्फाजो के समंदर !

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